Wednesday, November 28, 2007

न्यूज चैनल मास मीडियम नहीं हैं

मीडिया के वर्गभेद पर पांचवी किस्त
अजीत द्विवेदी
न्यूज चैनल मास मीडियम नहीं हैं - आशुतोष
मीडिया के सरोकार कैसे तय होते हैं, क्यों झुग्गियों का विस्थापन मीडिया के लिए बड़ी खबर नहीं है, राजधानी दिल्ली में होने वाली सीलिंग क्यों इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट दोनों समाचार माध्यमों के लिए अपने सरोकार की खबर लगने लगती है। ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनकी थोड़ी गहरी पड़ताल से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। सराय की पिछली चार पोस्टिंग में मैने इस पर कुछ तथ्यात्मक और कुछ सैद्धांतिक चीजें डाली हैं। अपनी पड़ताल के क्रम में मैंने इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े कुछ वरिष्ठ और समझदार पत्रकारों से बातचीत की। इन सवालों से रूबरू होते हुए उन्होंने न सिर्फ इस माध्यम की सीमाओं और बाध्यताओं को रेखांकित किया, बल्कि इसके बदलते रूझानों और सरोकारों के लिए समाज को भी कठघरे में खड़ा किया। अपनी बेबाकी के लिए मशहूर टीवी पत्रकार और संप्रति आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष से हुई बातचीत के कुछ अंश इस पोस्ट में डाल रहा हूं।
सवाल – दिल्ली में सीलिगं की खबरों की कवरेज यमुना के पुश्ते से हुए विस्थापन की कवरेज से कई गुना बड़ी थी, जबकि पुश्ते पर का विस्थापन कहीं ज्यादा लोगों को प्रभावित कर रहा था।
जवाब – यमुना पुश्ते के विस्थापन और दिल्ली में सीलिंग की कवरेज अलग-अलग ढंग से हुई। इस बात को समझने के लिए न्यूज चैनलों के बारे में कुछ बुनियादी बातों को समझना जरूरी है। यह अपने आप में एक मिथक है कि न्यूज चैनल एक मास मीडियम हैं और पूरे हिंदुस्तान को रिप्रजेंट करते हैं। इस भ्रांति से उबरने की जरूरत है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इसकी पॉपुलिरटी के आकलन का एक ही तरीका है और वह है टैम रेटिंग। इस टैम रेटिंग के बक्से गांवों में नहीं लगे हैं और न छोटे शहरों में। इसकी 50 फीसदी रेटिंग सिर्फ दो शहरों – दिल्ली और मुंबई से आती है। बाकी 50 फीसदी में गांवों और छोटे शहरों का कोई हिस्सा नहीं है। और यही से शुरू होता है भेदभाव क्योंकि यह रेटिंग अपने आप में रूरल-अरबन, छोटे-बड़े, अमीर-गरीब आदि डिवाइड को जन्म देता है। दूसरी बात, मीडियम रेवेन्यू ड्रिवेन मीडियम है। इसका संचालन एडवरटाइजर को ध्यान में रख करना होता है। यह देखना होता है कि जिनके बारे में दिखाया जा रहा है और उसे देखने वाले जो संभावित दर्शक हैं उनकी बाईंग कैपेसिटी कैसी है। असल में बाईंग कैपेसिटी वाले ऑडिएंस की जरूरत इस भेदभाव की बुनियाद में है। अगर सीलिंग में आ रहे लोग और उनकी खबरें देखने वाले अच्छी बाईंग कैपेसिटी वाले लोग हैं तो उसकी कवरेज ज्यादा होगी।
सवाल – फिर ऐसे क्यों है दिल्ली में सीलमपुर और मुंबई में एशिया के सबसे बड़े स्लम धारावी में काफी बड़ी संख्या में टैम रेटिंग के बक्से लगे हुए हैं।
जवाब – यह बात आंशिक रूप से सही है। ये इलाके भी अरबन हैं और यह मान कर नहीं चलना चाहिए कि यहां की ऑडिएंस देश के समृद्ध हिस्से की या ग्लैमर या क्रिकेट की खबरें नहीं देखना चाहते।
सवाल – खबरों के चयन का आधार क्या सिर्फ टैम रेटिंग ही है।
जवाब – दरअसल कुछ चीजें सार्वभौमिक हैं। जैसे अगर दक्षिण दिल्ली के किसी उच्च मध्यम वर्ग के व्यक्ति ने आत्महत्या की हो और उसी समय यमुना पार की किसी बस्ती में किसी ने आत्महत्या की है तो न्यूज चैनल दक्षिण दिल्ली की घटना को प्राथमिकता देंगे। जब सापेक्षिक तुलना की बात आएगी तो टैम रेटिंग को ज्यादा तवज्जो दी जाएगी।
सवाल – लेकिन यमुना पुश्ते का विस्थापन और सीलिंग की घटनाओं के बीच तो तीन साल का अंतर है, यहां सापेक्षिक तुलना की बात कैसे आएगी।
जवाब – यहां च्वाइस और प्रायोरिटी की बात है, एडवरटाइजर की बात है, बाईंग कैपेसिटी वाले ऑडिएंस की बात, इस तरह के कई कारण हैं। मैं मानता हूं कि इन सवालों को लेकर मीडिया में कुछ बायस हैं। लेकिन यह पूरी तरह से सही नहीं है कि मीडिया जानबूझ कर किसी वर्ग के प्रति अधिक सहानुभूति दिखाता है।
सवाल- इन दोनों घटनाओं की कवरेज में सिर्फ इतना फर्क नहीं था कि एक को ज्यादा दिखाया और दूसरे को कम, बल्कि एक तरह से मीडिया का स्वर पुश्ते के विस्थापन को सही ठहराने वाला था, जबिक सीलिंग में उसकी स्पष्ट सहानुभूति पीड़ित लोगों के प्रति दिख रही थी।
जवाब – मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा हूं कि थोड़ा बहुत बायस है। लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। मैं या कोई भी टेलीविजन चैनल किसी भी गैरकानूनी काम को डिफेंड नहीं कर सकता है। इसलिए मुझे नहीं लगता है कि चैनलों ने अवैध ढंग से रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक प्रतिष्ठान चला रहे लोगों को डिफेंड किया और पुश्ते पर अवैध ढंग से बसे लोगों को उजाड़ने की तरफदारी की। अगर किसी स्तर पर कवरेज में थोड़ा भेदभाव दिखा, तो उसे मीडियम की अनिवार्यता मानना चाहिए। शहर में जो सीलिंग हो रही थी, वह बहुत बड़ी घटना था, एक स्वाभाविक आक्रोश सड़कों पर उमड़ा था, उसमें बड़े फैशन मॉडल्स और माल्स सील हो रहे थे, जिसका विजुअल टेलीविजन के लिहाज से प्रभावकारी बन रहा था।
सवाल – फिर क्यों टेलीविजन चैनल आम लोगों या गरीबों की अनदेखी के लिए सरकारों को कठघरे में खड़ा करते हैं, क्या यहां गरीब टैम रेटिंग की कसौटी पर खरा उतरते हैं।
जवाब – यहां पहली चीज खबर होती है। सरकार की नीतियां चाहें किसी एक वर्ग के खिलाफ हों या फायदे में, सिर्फ उस वर्ग की खबर नहीं होती हैं।
सवाल – जिस समय पुश्ते पर विस्थापन हुआ, उसके तीन महीने बाद लोकसभा चुनाव होने वाले थे और इस लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। ऐसे में मानवीय आधार पर न सही, राजनीतिक आधार पर तो इसे कवर किया जाना चाहिए था।
जवाब – पोलिटिक्स खुद ही टेलीविजन की खबरों से गायब है। अब वो जमाना नहीं रहा, जब पीएम या सीएम का बयान पहली खबर बन जाया करते थे। अब पोलिटिकल इवेंट खबर के तौर पर हाशिए पर चले गए हैं। जब पोलिटिक्स खबर को डिफाइन नहीं कर रही है तो उससे प्रभावित होने या उसे प्रभावित करने वाली घटना अपने आप खबर के दायरे से बाहर हो जाती है।
सवाल – टेलीविजन की खबरों में मानवीय सरोकारों के लिए कितनी जगह बची है।
जवाब – आर्थिक सुधारों के लागू होने के बाद मानवीय सरोकार के लिए हर जगह स्पेस कम हुआ है। अगर खासतौर से टेलीविजन न्यूज चैनलों के सरोकारों के बारे में बात करें तो यह ध्यान रखना चाहिए, व्यापक रूप से जिसे सरोकारों से भटकाव माना जा रहा है, वह दरअसल एक सामाजिक बदलाव है। मीडिया मानवीय सरोकारों से दूर नहीं हुआ है। लोगों की गलती ये है कि वे इन सरोकारों को एक दशक या उससे भी पुराने चश्मे से देख रहे हैं। हकीकत यह है कि मीडिया ने आम आदमी को ज्यादा ताकतवर बनाया है। इसने आम आदमी को एक बड़ा प्लेटफार्म दिया है। साथ ही इसने देश के कल्चरल यूनिफिकिशेन के बेहद जरूरी काम को भी अंजाम दिया है।

1 comment:

Srijan Shilpi said...

आशुतोष के जवाब से तो साफ लगता है कि जैसे-जैसे पत्रकारिता के करियर में उनकी तरक्की का ग्राफ चढ़ता गया है, वैसे-वैसे उनके सरोकार और समझ का ग्राफ उतरता भी गया है।

मैं ऐसे लोगों को अब पत्रकार कहता भी नहीं हूं। ये लोग इंफोटेनमेंट बिजनेस के मैनेजर-कम-दलाल हैं। उनसे क्या उम्मीद करना !